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Thursday, 8 May 2014

पत्थर देह- संजय शेफर्ड


देह पत्थर होती है
दर्द, तड़प, आँसू  
देह के नहीं  
संवेंदनाओं, भावनाओं,
अहसासों के होते हैं 
पहले  संवेंदनायें मरती हैं 
किर भावनायें 
किर अहसास 
अंत में मरता है 'प्रेम'

देह तब भी पत्थर था, 
अब भी पत्थर ही है |


 -संजय शेफर्ड 

(लेखक बीबीसी गैलरी एशिया में कार्यरत हैं 


  तथा जीवन मैग के सलाहकार हैं)

www.jeevanmag.com
(चित्रांकन- आर्यन राज)
एलन कैरियर इंस्टिट्यूट, कोटा











Excerpted from- Jeevan Mag Feb.- march 2014 issue


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Friday, 2 May 2014

मेरा प्रेम- संजय शेफर्ड

बहुत ही अबोध हूं
बहुत ही अबोध है
मेरा प्रेम
जो कहना चाहता हूं
कह देता हूं
तुम्हारे बिना कहे
तुम्हें सुन लेता हूं
गलतियों पर डांटता
भूल पर फटकारता हूं
तुम रूठती हो तो
मना लेता हूं
मान जाती हो तो
जाने अनजाने
तुम्हें रुला देता हूं
* * *
तुम्हारे आंसू
तुम्हारे दर्द
तुम्हारी तड़प
तुम्हारी भावनाएं
तुम्हारी संवेदनाएं
मुझमें बहती है
तुम्हारे हर दर्द
सहती और गहती हैं
हंसने की बारी आती है
संग -संग हंसता हूं
रोने की बारी में
तुमसे छुप-छुपकर
रो लेता हूं
* * *
हर पल
तुम्हें सुनता हूं
तुम्हें ही सुनाता हूं
खुशियों को हर बार
साझा कर लेता हूं
दर्द को छुपाता हूं
चाहूं तो साझा कर लूं
दर्द के साथ आंसू भी
जानता हूं
पी जाओगी
मेरे हर गम
तुम हंसते -हंसते
पर बांटू तो मैं बांटू कैसे ?
* * *
खुशियां सूद हैं
जीवन की
दर्द है पूंजी हमारे
हरे -भरे प्रेम उपवन की
कुछ दर्द उठे
कुछ फूल खिले
तुम प्रेयसी
चौका-बर्तन की
मैं प्रेमी घर आंगन का
तुम लिखती हो प्रेम
दर्द मिटाता हूं
मैं प्रेम पथिक
प्रेम के पथ पर चलकर।


-संजय शेफर्ड 
(लेखक बीबीसी गैलरी एशिया में कार्यरत हैं तथा जीवन मैग के सलाहकार हैं)
www.jeevanmag.com



Excerpted from- Jeevan Mag Feb.- march 2014 issue

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Sunday, 25 August 2013

थोड़े से नमकीन शब्द- संजय शेफर्ड

मेरे थोड़े से नमकीन शब्द
रखकर देखना
तुम अपनी कड़वी जुबान पर
जीवन जब मीठेपन से भर जाए
तुम्हें जरुरत पड़ेगी
मेरे आवश्यकता से थोड़े ज्यादा
तीखे, कड़वे, कसैले शब्दों की
सच मानों
चाहे तो चखकर देख लो
यह शब्द उतने नमकीन नहीं
जितने तुम्हारे तलवार की धार है
यह काटते जरुर हैं
लेकिन तुम्हारी तलवार की माफ़िक
लहुलुहान नहीं करते
जिस्म को . . .
और यह शब्दों का कड़वापन क्या ?
लहू से ज्यादा तो . . .
किसी हाल में नहीं हो सकता ?
तुम तो लहू पीकर ही जिन्दा रहे हो
फिर मेरे शब्दों से परहेज क्यों ?
एक बार चखकर देखना
कुछ नहीं तो स्वाद के नयेपन के लिए!
 - संजय शेफर्ड, शोधकर्ता
बी.बी.सी हिन्दी
 





जीवन मैग जनवरी 2014 अंक से उद्धृत- मूल अंक यहाँ से डाउनलोड करें - https://ia600505.us.archive.org/7/items/JeevanMag4/Jeevan%20Mag%204.pdf

A series of skype group conversations beetween students from India & Pakistan

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